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Manto Kee Vivaadit Kahaaniyaan

Manto Kee Vivaadit Kahaaniyaan

  • Author: Saadat Hasan Manto

“मेरी तो आप ने ज़िंदगी हराम कर रखी है…. ख़ुदा करे मैं मर जाऊं।” “अपने मरने की दुआएं क्यों मांगती हो। मैं मर जाऊं तो सारा क़िस्सा पाक हो जाएगा...... कहो तो मैं अभी ख़ुदकुशी करने के लिए तैय्यार हूँ। यहां पास ही अफ़ीम का ठेका है। एक तौला अफ़ीम काफ़ी होगी।” “जाओ, सोचते क्या हो।” “जाता हूँ...... तुम उठो और मुझे...... मालूम नहीं एक तौला अफ़ीम कितने में आती है। तुम मुझे अंदाज़न दस रुपय दे दो।” “दस रुपय?” “हाँ भई...... अपनी जान गंवानी है..... दस रुपय ज़्यादा तो नहीं।” “मैं नहीं दे सकती।” “ज़रूर आप को अफ़ीम ख़ा के ही मरना है?” “संख्या भी हो सकता है।” “कितने में आएगा?” “मालूम नहीं...... मैंने आज तक कभी संख्या नहीं खाया।” “आप को हर चीज़ का इल्म है। बनते क्यों हैं?” “बना तुम मुझे रही हो........ भला मुझे ज़हरों की क़ीमतों के मुतअल्लिक़ क्या इल्म हो सकता है।” “आप को हर चीज़ का इल्म है।”

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